लोकोक्तियाँ
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एक नज़र में
- लोकोक्ति (कहावत) एक पूर्ण वाक्य होता है जो लोक-अनुभव से उपजे किसी सत्य, शिक्षा या व्यंग्य को संक्षेप में कहता है — "अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत"।
- मुहावरे से भेद: मुहावरा अधूरा वाक्यांश है और वाक्य में ढलता है; लोकोक्ति स्वतः पूर्ण वाक्य है और अपने-आप में एक शिक्षा देती है।
- CUET में लोकोक्ति का अर्थ या उसका उपयुक्त प्रसंग पूछा जाता है। रणनीति वही है — अर्थ और प्रसंग याद रखो, शाब्दिक चित्र को छोड़कर निहित शिक्षा पकड़ो।
- परीक्षा-सत्य: +5 / −1। कहावत की सीख पहचानो और सही स्थिति से मिलाओ।
भाग 1 — प्रमुख लोकोक्तियाँ और उनके अर्थ
| लोकोक्ति | भावार्थ |
|---|---|
| अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत | समय निकल जाने पर पछताना व्यर्थ |
| ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर | काम शुरू किया तो कठिनाई से क्या डरना |
| नाच न जाने आँगन टेढ़ा | अपनी कमी दूसरे पर थोपना |
| दूर के ढोल सुहावने | दूर की वस्तु अच्छी लगती है |
| ऊँची दुकान फीका पकवान | नाम बड़े और दर्शन छोटे |
| अंधों में काना राजा | मूर्खों में थोड़ा जानकार भी बड़ा |
| एक अनार सौ बीमार | वस्तु थोड़ी, चाहने वाले बहुत |
| जिसकी लाठी उसकी भैंस | जो बलवान वही अधिकारी |
| आ बैल मुझे मार | जान-बूझकर मुसीबत मोल लेना |
| थोथा चना बाजे घना | जिसमें गुण कम वह दिखावा अधिक करे |
| नौ नकद न तेरह उधार | उधार से नकद भला |
| बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद | गुणहीन को गुण की पहचान नहीं |
| हाथ कंगन को आरसी क्या | प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता |
| जैसी करनी वैसी भरनी | जैसा कर्म वैसा फल |
| डूबते को तिनके का सहारा | संकट में छोटी मदद भी बड़ी |
| का बरखा जब कृषि सुखाने | अवसर निकल जाने पर सहायता व्यर्थ |
| चोर की दाढ़ी में तिनका | अपराधी स्वयं घबराता है |
| घर का भेदी लंका ढाए | भीतरी व्यक्ति ही नाश कराता है |
| दाल में काला होना | कुछ गड़बड़ होना |
| मुँह में राम बगल में छुरी | ऊपर से मित्र, भीतर से शत्रु |
| आम के आम गुठलियों के दाम | दोहरा लाभ |
| जो गरजते हैं वे बरसते नहीं | बढ़-चढ़कर कहने वाले करते नहीं |
| एक हाथ से ताली नहीं बजती | झगड़े में दोनों पक्ष दोषी |
| अधजल गगरी छलकत जाए | अल्पज्ञ अधिक दिखावा करता है |
| भागते भूत की लँगोटी ही सही | जो मिले उसी में संतोष |
भाग 2 — मुहावरा बनाम लोकोक्ति (भेद स्पष्ट रखें)
| आधार | मुहावरा | लोकोक्ति |
|---|---|---|
| रूप | अधूरा वाक्यांश | पूर्ण वाक्य |
| प्रयोग | वाक्य में ढलकर आता है | अपने-आप में स्वतंत्र |
| उद्देश्य | भाषा को सजीव बनाना | जीवन-शिक्षा/व्यंग्य देना |
| उदाहरण | "नाक में दम करना" | "जैसी करनी वैसी भरनी" |
यह भेद परीक्षा में सीधे पूछा जा सकता है, इसलिए एक-एक उदाहरण के साथ याद रखें।
भाग 3 — विषय के अनुसार समूह
- पछतावा/अवसर बीतना: अब पछताए होत क्या…, का बरखा जब कृषि सुखाने।
- दिखावा/अल्पज्ञान: थोथा चना बाजे घना, अधजल गगरी छलकत जाए, ऊँची दुकान फीका पकवान।
- कर्मफल: जैसी करनी वैसी भरनी, आ बैल मुझे मार।
- बल/अधिकार: जिसकी लाठी उसकी भैंस, अंधों में काना राजा।
- छिपा शत्रु/भेद: घर का भेदी लंका ढाए, मुँह में राम बगल में छुरी।
- संतोष/सहारा: डूबते को तिनके का सहारा, भागते भूत की लँगोटी ही सही।
भाग 4 — अर्थ पहचानने की विधि
- शाब्दिक चित्र छोड़ो — "ओखली में सिर देना" का अर्थ ओखली नहीं, जोखिम उठाना है।
- निहित शिक्षा पकड़ो — हर लोकोक्ति एक जीवन-सत्य कहती है; वही उत्तर है।
- प्रसंग से मिलाओ — प्रश्न में दी गई स्थिति किस सीख से मेल खाती है, यह देखो।
- समान कहावतों में भेद करो — "थोथा चना बाजे घना" और "अधजल गगरी छलकत जाए" दोनों दिखावे पर हैं, पर शब्द भिन्न; प्रश्न के अनुसार चुनो।
भाग 5 — हल किए हुए उदाहरण
- परीक्षा के बाद पढ़ाई शुरू करना — कौन-सी कहावत? → अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
- कमज़ोर खिलाड़ी अपनी हार के लिए मैदान को दोष दे — → नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
- जो बहुत बोलता है पर करता कुछ नहीं — → जो गरजते हैं वे बरसते नहीं।
- एक ही नौकरी के सौ उम्मीदवार — → एक अनार सौ बीमार।
- भीतरी व्यक्ति द्वारा भेद खोलकर नुकसान — → घर का भेदी लंका ढाए।
- एक काम से दो लाभ — → आम के आम गुठलियों के दाम।
- बलवान का ही अधिकार चलता है — → जिसकी लाठी उसकी भैंस।
- ऊपर से मित्र, भीतर शत्रुता — → मुँह में राम बगल में छुरी।
- प्रत्यक्ष बात में प्रमाण की आवश्यकता नहीं — → हाथ कंगन को आरसी क्या।
- संकट में छोटी-सी सहायता भी बड़ी — → डूबते को तिनके का सहारा।
भाग 6 — और लोकोक्तियाँ (अभ्यास हेतु)
| लोकोक्ति | भावार्थ |
|---|---|
| अपनी गली में कुत्ता भी शेर | अपने क्षेत्र में सब बलवान |
| नाम बड़े और दर्शन छोटे | प्रसिद्धि अधिक, गुण कम |
| जल में रहकर मगर से बैर | जिसके आश्रय में रहो उससे बैर ठीक नहीं |
| आधी छोड़ सारी को धावे | लोभ में सब कुछ खोना |
| दाम बनाए काम | धन से सब काम सध जाते हैं |
| बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा | बिना प्रयास अचानक लाभ |
| जैसा देश वैसा भेष | परिस्थिति के अनुसार ढलना |
| एक म्यान में दो तलवार नहीं | एक स्थान पर दो समान शक्तियाँ नहीं |
| होनहार बिरवान के होत चीकने पात | प्रतिभा बचपन में ही झलकती है |
| सौ सुनार की एक लोहार की | कमज़ोरों के सौ वार पर बलवान का एक भारी |
भाग 6ख — और भी प्रचलित लोकोक्तियाँ (विस्तृत सूची)
| लोकोक्ति | भावार्थ |
|---|---|
| ऊँट के मुँह में जीरा | बहुत कम मात्रा |
| खोदा पहाड़ निकली चुहिया | अधिक परिश्रम, अल्प फल |
| गागर में सागर भरना | थोड़े में बहुत कहना |
| चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात | सुख क्षणिक है |
| जितनी चादर हो उतने पैर पसारो | अपनी सीमा में रहो |
| जिसके पास नहीं चार वो सबसे गया-बीता | निर्धन की कोई नहीं सुनता |
| दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है | एक बार ठगा सदा सतर्क |
| न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी | कारण ही न रहे तो परिणाम कैसा |
| बंदर के हाथ में नारियल | अयोग्य के पास बहुमूल्य वस्तु |
| भैंस के आगे बीन बजाना | मूर्ख को समझाना व्यर्थ |
| मान न मान मैं तेरा मेहमान | बिना बुलाए घुसना |
| रस्सी जल गई पर ऐंठन न गई | दशा बिगड़ने पर भी अकड़ बनी रहे |
| लातों के भूत बातों से नहीं मानते | दुष्ट कठोरता से ही मानते हैं |
| सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है | पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति |
| हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और | कथनी और करनी में अंतर |
भाग 7 — लोकोक्तियाँ लोक-अनुभव का निचोड़ क्यों हैं
लोकोक्तियाँ किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव का संचित ज्ञान हैं। जब हमारे पूर्वजों ने बार-बार देखा कि अवसर बीत जाने पर पछताना व्यर्थ है, तो यह सत्य "अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" जैसी कहावत में ढल गया। इसी कारण लोकोक्ति में एक ठोस, सिद्ध जीवन-सत्य होता है, और परीक्षा में उसका उत्तर सदा वही सार्वभौम सीख होती है, न कि शाब्दिक चित्र। इन्हें समझने का सर्वोत्तम तरीका है — हर कहावत के पीछे की कहानी या स्थिति की कल्पना करना। "घर का भेदी लंका ढाए" के पीछे रामायण का प्रसंग है, जहाँ विभीषण द्वारा बताए भेद से रावण की लंका नष्ट हुई; यह चित्र मन में बैठते ही अर्थ स्थायी हो जाता है कि भीतरी व्यक्ति ही सबसे बड़ा नुकसान करता है। परीक्षा में लोकोक्ति-प्रश्न प्रायः एक स्थिति देकर पूछते हैं कि कौन-सी कहावत उस पर लागू होती है; ऐसे में स्थिति का मूल भाव (पछतावा? दिखावा? कर्मफल? छिपा शत्रु?) पहचानिए और उसी भाव की कहावत चुनिए। यही विधि समान दिखने वाली कहावतों — जैसे "थोथा चना बाजे घना" और "अधजल गगरी छलकत जाए" — में भी सही चुनाव कराती है, क्योंकि आप शब्दों से नहीं, भाव और प्रसंग से निर्णय करते हैं।
भाग 8 — स्थिति से कहावत मिलाने की कला (परीक्षा-विधि)
CUET में लोकोक्ति के प्रश्न प्रायः दो रूपों में आते हैं — या तो कहावत देकर उसका अर्थ पूछा जाता है, या एक स्थिति देकर पूछा जाता है कि उस पर कौन-सी कहावत ठीक बैठती है। दूसरा रूप अधिक चुनौतीपूर्ण है, पर एक सरल विधि से सध जाता है। पहले स्थिति का मूल भाव एक शब्द में पकड़िए — क्या यहाँ पछतावा है? दिखावा है? कर्मफल है? छिपा शत्रु है? लोभ है? असमर्थता है? — और फिर उसी भाव के समूह (भाग 3) से कहावत चुनिए। उदाहरण के लिए, यदि स्थिति है "एक व्यक्ति बहुत बड़ी-बड़ी बातें करता है पर काम के समय गायब हो जाता है", तो मूल भाव है दिखावा/खोखलापन, और सटीक कहावत है "थोथा चना बाजे घना" या "जो गरजते हैं वे बरसते नहीं"। यदि दोनों विकल्प में हों, तो स्थिति के सूक्ष्म संकेत देखिए — यदि बात "शोर/आवाज़" पर है तो "थोथा चना बाजे घना", और यदि "गरजना-बरसना/वादा-निभाना" पर है तो दूसरी। इसी प्रकार "किसी ने थोड़ा-सा परिश्रम किया और बड़ी डींग हाँकी, पर निकला कुछ नहीं" का भाव है अल्प फल, और कहावत है "खोदा पहाड़ निकली चुहिया"। यह भाव-आधारित विधि रटने से कहीं अधिक विश्वसनीय है, क्योंकि परीक्षा में स्थिति के शब्द बदल सकते हैं, पर भाव नहीं बदलता। इसलिए अभ्यास करते समय हर कहावत के सामने उसका एक-शब्द भाव लिख लीजिए; यही आपकी सबसे तेज़ कुंजी बनेगा।
भाग 9 — इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें
भाग 1, 6 और 6ख की कहावतों को उनके भावार्थ के साथ समूहों (भाग 3) में याद करें, मुहावरे–लोकोक्ति का भेद (भाग 2) स्पष्ट रखें, हर कहावत के पीछे की स्थिति की कल्पना करें (भाग 7), और स्थिति-से-कहावत मिलाने की विधि (भाग 8) का अभ्यास करें। प्रत्येक कहावत के लिए एक उपयुक्त प्रसंग सोचना सबसे प्रभावी अभ्यास है।
एक पंक्ति का सार: लोकोक्ति पूर्ण वाक्य है जो जीवन-शिक्षा देती है; शाब्दिक चित्र छोड़कर निहित सीख पकड़ो, समान कहावतों में शब्दों से भेद करो, और सही प्रसंग से मिलाओ।
Practice questions
Now test yourself. 8 free sample questions with explanations. 22 more in the timed practice test.
Q1. "थोथा चना बाजे घना" लोकोक्ति किस प्रकार के व्यक्ति पर लागू होती है?
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Answer: A
इस कहावत का भाव है कि जैसे खोखला चना अधिक खड़खड़ाता है, वैसे ही कम गुण वाला व्यक्ति अधिक बढ़-चढ़कर बातें और दिखावा करता है।
Q2. "बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद" लोकोक्ति का अर्थ है—
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Answer: A
इस कहावत का भाव है कि जिस व्यक्ति में किसी वस्तु के गुणों को परखने की योग्यता या समझ न हो, वह उसका वास्तविक मूल्य नहीं जान सकता।
Q3. मोहन ने पहले स्वयं झगड़ा शुरू किया और बाद में स्वयं ही शांति की बात करने लगा। इस आचरण के लिए उपयुक्त लोकोक्ति है—
▸ Show answer & explanation
Answer: B
यहाँ शांति-प्रिय आचरण को व्यक्त करने हेतु "आप भला तो जग भला" उपयुक्त है, जिसका भाव है कि जो स्वयं भला होता है, उसे संसार भी भला दिखता है।
Q4. किसान ने पूरी फसल एक ही व्यापारी को बेचने का सौदा कर लिया; बाद में दूसरा व्यापारी अधिक दाम देने आया तो किसान कुछ न कर सका। दूरदर्शिता की कमी पर चोट करने वाली उपयुक्त लोकोक्ति है—
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Answer: D
"बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय" का भाव है कि जैसा कर्म या निर्णय करोगे वैसा ही फल मिलेगा; बिना सोचे किए सौदे का परिणाम किसान को भुगतना पड़ा।
Q5. "खोदा पहाड़ निकली चुहिया" लोकोक्ति किस स्थिति को व्यक्त करती है?
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Answer: A
इस कहावत का भाव है कि किसी कार्य में बहुत अधिक परिश्रम और साधन लगाने के बावजूद नाममात्र का या नगण्य परिणाम प्राप्त होना।
Q6. सेठ जी सबके सामने दान-धर्म की बड़ी बातें करते हैं, पर घर के नौकर को महीनों वेतन नहीं देते। इस दोहरे आचरण के लिए उपयुक्त लोकोक्ति है—
▸ Show answer & explanation
Answer: A
"हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और" का भाव है कि किसी का दिखावा कुछ और तथा वास्तविक आचरण कुछ और हो—सेठ जी का व्यवहार यही दर्शाता है।
Q7. "चोर की दाढ़ी में तिनका" लोकोक्ति का भाव क्या है?
▸ Show answer & explanation
Answer: A
इस कहावत का भाव है कि दोषी व्यक्ति मन में भयभीत रहता है और अपने ही हाव-भाव या असावधानी से अपना अपराध प्रकट कर देता है।
Q8. "नाम बड़े और दर्शन छोटे" लोकोक्ति का सही अर्थ है—
▸ Show answer & explanation
Answer: A
इस कहावत का भाव है कि किसी की कीर्ति या प्रसिद्धि बहुत हो, परंतु वास्तविक गुण, योग्यता अथवा प्रदर्शन उतना प्रभावशाली न हो।
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