रस और छंद
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एक नज़र में
- यह पाठ हिंदी काव्यशास्त्र के दो स्तंभों को जोड़ता है — रस (काव्य पढ़ने/सुनने से उत्पन्न आनंद-भाव) और छंद (काव्य की लयबद्ध रचना, मात्रा/वर्ण की गणना पर आधारित)।
- रस "काव्य की आत्मा" कहलाता है; इसके नौ (कभी-कभी दस) भेद हैं, और प्रत्येक का एक स्थायी भाव होता है। छंद काव्य का "शरीर/लय" है।
- CUET में रस या उसका स्थायी भाव पहचानना, तथा छंद के प्रकार/लक्षण पूछे जाते हैं।
- परीक्षा-सत्य: +5 / −1। रस को उसके स्थायी भाव से और छंद को उसके मात्रा/चरण-नियम से पहचानो।
भाग 1 — नौ रस और उनके स्थायी भाव
| रस | स्थायी भाव | भाव/विषय |
|---|---|---|
| शृंगार | रति | प्रेम, सौंदर्य (संयोग/वियोग) |
| हास्य | हास | हँसी, उपहास |
| करुण | शोक | दुख, वियोग, मृत्यु |
| रौद्र | क्रोध | क्रोध, प्रतिशोध |
| वीर | उत्साह | वीरता, पराक्रम |
| भयानक | भय | डर, आतंक |
| बीभत्स | जुगुप्सा (घृणा) | घृणा, गंदगी |
| अद्भुत | विस्मय | आश्चर्य, अचंभा |
| शांत | निर्वेद | वैराग्य, शांति, मोक्ष |
| (वात्सल्य) | वत्सलता | संतान-स्नेह (दसवाँ रस) |
भाग 2 — रस के अंग (आधार)
रस-निष्पत्ति के चार अंग होते हैं:
- स्थायी भाव — मन में स्थिर मूल भाव (रति, हास, शोक आदि)।
- विभाव — भाव को जगाने वाले कारण (आलंबन व उद्दीपन)।
- अनुभाव — बाहरी चेष्टाएँ (कंपन, अश्रु, रोमांच)।
- संचारी भाव — क्षणिक भाव (लज्जा, चिंता, हर्ष)। स्थायी भाव जब विभाव-अनुभाव-संचारी से पुष्ट होकर आस्वाद-योग्य बनता है, तब रस की निष्पत्ति होती है।
भाग 3 — छंद के भेद
छंद दो प्रकार के होते हैं:
| प्रकार | आधार | उदाहरण छंद |
|---|---|---|
| मात्रिक | मात्राओं की गणना | दोहा, चौपाई, सोरठा, रोला |
| वर्णिक | वर्णों की गणना | सवैया, कवित्त, इंद्रवज्रा |
मात्रा गणना: ह्रस्व स्वर/वर्ण = 1 मात्रा (लघु); दीर्घ स्वर/वर्ण = 2 मात्रा (गुरु)।
भाग 4 — प्रमुख छंदों के लक्षण
| छंद | लक्षण |
|---|---|
| दोहा | अर्धसम मात्रिक; 4 चरण; विषम चरण 13 मात्रा, सम चरण 11 मात्रा (13+11) |
| सोरठा | दोहा का उल्टा; विषम 11, सम 13 |
| चौपाई | सम मात्रिक; प्रत्येक चरण 16 मात्रा |
| रोला | मात्रिक; प्रत्येक चरण 24 मात्रा (11+13) |
| कुंडलिया | दोहा + रोला का मेल; 6 चरण |
| सवैया | वर्णिक; प्रति चरण 22–26 वर्ण |
भाग 5 — विधि (रस/छंद कैसे पहचानें)
- रस के लिए स्थायी भाव खोजो — पंक्ति में कौन-सा मूल भाव है? प्रेम → शृंगार; शोक → करुण; उत्साह → वीर; क्रोध → रौद्र।
- छंद के लिए मात्रा गिनो — चरणों की संख्या और प्रत्येक चरण की मात्रा से छंद तय करो (13+11 → दोहा; 16 → चौपाई)।
- लघु-गुरु पहचानो — ह्रस्व = 1, दीर्घ = 2; अनुस्वार/संयुक्त से पूर्व प्रायः गुरु।
भाग 6 — हल किए हुए उदाहरण
- वियोग/प्रेम-वर्णन → रस = शृंगार (स्थायी भाव रति)।
- युद्ध में वीरता का वर्णन → वीर रस (उत्साह)।
- पुत्र-वियोग में रुदन → करुण रस (शोक)।
- माँ का शिशु-स्नेह → वात्सल्य रस।
- भयानक दृश्य से डर → भयानक रस (भय)।
- चरण 13+11 मात्रा, 4 चरण → छंद = दोहा।
- प्रत्येक चरण 16 मात्रा → चौपाई।
- विषम 11, सम 13 → सोरठा।
- हास्यपूर्ण वर्णन → हास्य रस (हास)।
- वैराग्य/शांति का भाव → शांत रस (निर्वेद)।
भाग 7 — सामान्य भ्रम (ट्रैप)
- रस बनाम स्थायी भाव — "शोक" स्थायी भाव है, उससे बनने वाला रस "करुण" है; दोनों में भेद रखें।
- दोहा बनाम सोरठा — दोनों में 13 व 11 मात्रा, पर क्रम उल्टा (दोहा 13+11, सोरठा 11+13)।
- शृंगार के दो पक्ष — संयोग (मिलन) और वियोग (विरह) — दोनों शृंगार ही हैं।
- वीर बनाम रौद्र — वीर का भाव उत्साह/पराक्रम; रौद्र का भाव क्रोध/प्रतिशोध।
भाग 8 — रस काव्य की आत्मा क्यों है
भारतीय काव्यशास्त्र में रस को "काव्य की आत्मा" कहा गया है, और यह केवल अलंकारिक कथन नहीं — इसका गहरा अर्थ है। जब हम कोई कविता पढ़ते या सुनते हैं और हमारे मन में प्रेम, करुणा, वीरता या हास्य का भाव जाग उठता है, तो वही रसानुभूति काव्य का अंतिम प्रयोजन है; शब्द, अलंकार और छंद सब इसी आनंद-भाव को उत्पन्न करने के साधन हैं। आचार्य भरत मुनि ने "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" सूत्र में बताया कि रस की निष्पत्ति विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से होती है — अर्थात मन का स्थायी भाव जब उपयुक्त परिस्थितियों (विभाव), बाहरी चेष्टाओं (अनुभाव) और क्षणिक भावों (संचारी) से पुष्ट होता है, तब वह आस्वाद-योग्य रस बन जाता है। परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण कौशल है — रस और स्थायी भाव के बीच का संबंध याद रखना, क्योंकि प्रश्न अक्सर दोनों रूपों में आता है: कभी रस पूछकर स्थायी भाव, कभी स्थायी भाव पूछकर रस। यदि आपने नौ रस और उनके नौ स्थायी भाव जोड़े के रूप में पक्के कर लिए (रति-शृंगार, हास-हास्य, शोक-करुण, क्रोध-रौद्र, उत्साह-वीर, भय-भयानक, जुगुप्सा-बीभत्स, विस्मय-अद्भुत, निर्वेद-शांत), तो रस के अधिकांश प्रश्न तुरंत हल हो जाएँगे। साथ ही पंक्ति का मूल भाव पकड़ने का अभ्यास कीजिए — क्या यहाँ प्रेम है, शोक है, वीरता है या भय — क्योंकि वही भाव सीधे रस की ओर ले जाता है।
भाग 9 — इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें
नौ रस और उनके स्थायी भाव (भाग 1) जोड़े के रूप में याद करें, रस के चार अंग (भाग 2) समझें, मात्रिक व वर्णिक छंदों के लक्षण (भाग 3, 4) और मात्रा-गणना सीखें। रस के लिए पंक्ति का मूल भाव और छंद के लिए मात्रा-गणना का अभ्यास करें; भाग 7 के भ्रमों (दोहा-सोरठा, वीर-रौद्र) पर ध्यान दें।
एक पंक्ति का सार: रस काव्य की आत्मा है — नौ रस और उनके स्थायी भाव जोड़े में याद करो; छंद काव्य की लय है — मात्रा गिनकर दोहा (13+11), चौपाई (16) आदि पहचानो।
Practice questions
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Q1. रस के निष्पत्ति-सूत्र में 'स्थायी भाव' का सही अर्थ क्या है?
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Answer: B
स्थायी भाव वह स्थिर एवं प्रधान मनोवृत्ति है जो विभाव, अनुभाव और संचारी (व्यभिचारी) भावों से पुष्ट होकर रस-रूप में निष्पन्न होती है। बाहरी कारण विभाव कहलाते हैं।
Q2. "मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे। यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे॥" — अभिमन्यु के इस कथन में कौन-सा रस है?
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Answer: B
युद्ध के लिए उमड़ता 'उत्साह' स्थायी भाव यहाँ वीर रस की निष्पत्ति करता है; यमराज से भी युद्ध के लिए तत्पर होना वीरोचित उत्साह दर्शाता है।
Q3. "बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥" — यह किस छंद का उदाहरण है?
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Answer: C
प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ और तुकबद्ध चार चरणों वाली यह रचना चौपाई है; रामचरितमानस की यह पंक्ति चौपाई का प्रसिद्ध उदाहरण है।
Q4. रौद्र रस और वीर रस दोनों में आवेश रहता है, किंतु इनका मूल अंतर किस आधार पर किया जाता है?
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Answer: A
रौद्र रस का स्थायी भाव 'क्रोध' है जबकि वीर रस का स्थायी भाव 'उत्साह' है। यही दोनों रसों का आधारभूत भेद है।
Q5. शांत रस का स्थायी भाव क्या माना गया है?
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Answer: B
शांत रस का स्थायी भाव 'निर्वेद' (वैराग्य/उदासीनता) है, जिसमें सांसारिक विषयों से विरक्ति का भाव रहता है।
Q6. हास्य रस का स्थायी भाव क्या है?
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Answer: B
हास्य रस का स्थायी भाव 'हास' है। उत्साह वीर रस का, विस्मय अद्भुत रस का तथा जुगुप्सा वीभत्स रस का स्थायी भाव होता है।
Q7. "अब लौं नसानी, अब न नसैहौं। राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं॥" — संसार से विरक्ति प्रकट करती इन पंक्तियों में कौन-सा रस है?
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Answer: A
सांसारिक विषयों के प्रति 'निर्वेद' (वैराग्य) यहाँ शांत रस की निष्पत्ति करता है; राम-कृपा से भव-निशा बीत जाने का भाव वैराग्यपरक है।
Q8. "नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाडिम का समझकर भ्रांति से। देख कर सहसा हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है॥" — इस तोते की भूल से उत्पन्न कौन-सा रस है?
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Answer: A
तोते का नाक के मोती को अनार का दाना समझ बैठना तथा अपने ही प्रतिबिंब को दूसरा तोता मान लेना विसंगति उत्पन्न करता है, जिससे 'हास' स्थायी भाव जागता है — अतः हास्य रस है।
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