रस और छंद
रस और छंद is a frequently tested area in CUET Hindi. Work through these free NTA-style sample questions with full answers and explanations, then attempt all 35 in a timed practice test to build exam-day speed.
एक नज़र में
- रस काव्य पढ़ने या सुनने से मिलने वाला आनंद है और इसे काव्य की आत्मा कहा जाता है। नौ रस मान्य हैं, वात्सल्य और भक्ति को मिलाकर ग्यारह तक गिने जाते हैं, और हर रस का एक स्थायी भाव होता है।
- छंद काव्य की लय और गणना का नियम है। मात्रा गिनकर बनने वाले छंद मात्रिक हैं (दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला) और वर्ण गिनकर बनने वाले वर्णिक (सवैया, कवित्त, इंद्रवज्रा)।
- CUET में रस पहचानना, रस से स्थायी भाव मिलाना, रस के अंग (विभाव, अनुभाव, संचारी) पहचानना, छंद की मात्रा गिनना और मात्रिक या वर्णिक का भेद पूछा जाता है।
- कुंजी दो हैं: रस के लिए पंक्ति का मूल भाव और उसका स्थायी भाव; छंद के लिए चरण की मात्रा। इस पृष्ठ में दोनों के लिए तालिका, 15 हल सहित उदाहरण और 16 प्रश्नों का तीव्र अभ्यास है।
भाग 1 — रस और छंद क्या हैं और CUET इन्हें कैसे पूछता है
Written and reviewed by Omveer Thakur, English & Languages faculty at UniDrill (M.A. English, University of Delhi · 9 years teaching). Prepared for the CUET UG Hindi paper.
रस और छंद काव्य के दो अलग पक्ष हैं। रस भाव का पक्ष है, यानी कविता पाठक के मन में क्या जगाती है। छंद रूप का पक्ष है, यानी कविता का ढाँचा कैसा है। इसलिए रस के प्रश्न पंक्ति का भाव पूछते हैं, और छंद के प्रश्न पंक्ति की गिनती। दोनों के लिए तरीका अलग है और इसी कारण इस पृष्ठ में दोनों अलग-अलग भागों में हैं।
| प्रश्न का रूप | कैसा दिखता है | क्या करना है |
|---|---|---|
| पंक्ति से रस | काव्य-पंक्ति देकर रस पूछना | मूल भाव पहचानकर स्थायी भाव से रस तक |
| रस से स्थायी भाव | "करुण रस का स्थायी भाव" | जोड़ी की तालिका याद रखना |
| स्थायी भाव से रस | "निर्वेद किस रस का स्थायी भाव है" | उलटी जोड़ी |
| रस के अंग | विभाव, अनुभाव, संचारी की पहचान | पंक्ति के हिस्सों को अंग से मिलाना |
| संयोग या वियोग | शृंगार के किस पक्ष की पंक्ति | मिलन है या बिछोह |
| पंक्ति से छंद | दो चरण की मात्रा देकर नाम पूछना | मात्रा गिनकर अनुपात देखना |
| छंद का लक्षण | "13 और 11 मात्रा वाला छंद" | लक्षण से नाम तक |
| मात्रिक या वर्णिक | कोई छंद दिया, वर्ग पूछा | आधार मात्रा है या वर्ण |
| गण या मात्रा-गणना | शब्द की लघु-गुरु रचना | लघु और गुरु के चिह्न से गण |
भाग 2 — नौ रस और उनके स्थायी भाव
रस का आधार स्थायी भाव है, यानी वह मूल भाव जो हर मनुष्य के मन में स्थायी रूप से रहता है और काव्य की परिस्थिति से जाग उठता है।
| रस | स्थायी भाव | कब बनता है | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| शृंगार (संयोग) | रति | प्रेमी-प्रेमिका के मिलन में | कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात। भरे भौन में करत हैं नैनन ही सों बात॥ (बिहारी) |
| शृंगार (वियोग) | रति | बिछोह में, मिलन की आशा के साथ | निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहत पावस ऋतु हम पै जबतें श्याम सिधारे॥ (सूरदास) |
| हास्य | हास | विचित्र वेश, वाणी या चेष्टा से | नाक पर चश्मा चढ़ाए, चश्मे पर भी चश्मा रखे, दादाजी पूरे घर में चश्मा ढूँढ़ते घूमे |
| करुण | शोक | प्रिय के नाश या अपूरणीय हानि पर | बेटे की अर्थी उठते देख माँ बेसुध हो गई, आँसुओं की धार रुकती न थी |
| रौद्र | क्रोध | अपमान, अन्याय या शत्रुता पर | श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे। सब शोक अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे॥ (मैथिलीशरण गुप्त) |
| वीर | उत्साह | युद्ध, पराक्रम, दान या दया के काम में | खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी (सुभद्राकुमारी चौहान) |
| भयानक | भय | डरावने दृश्य या घटना से | अँधेरी रात, सुनसान जंगल, पीछे से भेड़ियों की हूक सुनकर उसका कलेजा काँप उठा |
| बीभत्स | जुगुप्सा | घृणित दृश्य, गंध या वस्तु से | सड़े मांस पर मँडराती मक्खियाँ, असह्य दुर्गंध, देखते ही मन घिन से भर उठा |
| अद्भुत | विस्मय | अलौकिक या अनोखी घटना से | हवा में तैरता महल देख सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं |
| शांत | निर्वेद (शम) | संसार की नश्वरता, वैराग्य पर | माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूँगी तोय॥ (कबीर) |
| वात्सल्य | वत्सलता | संतान या बालक के प्रति स्नेह में | किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत। मनिमय कनक नंद कैं आँगन बिंब पकरिबे धावत॥ (सूरदास) |
| भक्ति | भगवद्विषयक रति | ईश्वर के प्रति अनुराग में | मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पै आवै॥ (सूरदास) |
मूल नौ रस शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत हैं। वात्सल्य और भक्ति परवर्ती आचार्यों ने जोड़े। जिस प्रश्न में "नौ रस" पूछा जाए, वहाँ वात्सल्य या भक्ति न गिनें। जिसमें "दसवाँ" या "ग्यारहवाँ" पूछा जाए, वहाँ इन्हें गिनें।
भाग 3 — रस के चार अंग
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का सूत्र है कि विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। स्थायी भाव इन तीनों से पुष्ट होकर आस्वाद के योग्य रस बनता है।
| अंग | अर्थ | शब्दों में पहचान | करुण रस के उदाहरण |
|---|---|---|---|
| स्थायी भाव | मन में स्थायी रहने वाला मूल भाव | रति, हास, शोक आदि | शोक |
| विभाव: आलंबन | जिसके कारण भाव जागे (विषय) या जिसमें जागे (आश्रय) | व्यक्ति या वस्तु | आलंबन: पुत्र का शव; आश्रय: पिता |
| विभाव: उद्दीपन | जो जागे हुए भाव को तीव्र करे | वातावरण, चेष्टाएँ | अर्थी, रुदन की आवाज़ें, सूना घर |
| अनुभाव | भाव को बाहर प्रकट करने वाली शारीरिक चेष्टाएँ | आँसू, कंप, रोमांच, स्वरभंग | विलाप, छाती पीटना, आँसू |
| संचारी भाव | क्षणिक भाव जो आते-जाते रहें (तैंतीस माने गए हैं) | चिंता, विषाद, मोह, स्मृति | विषाद, मोह, स्मृति, चिंता |
अनुभाव दो प्रकार के होते हैं: कायिक (शरीर की चेष्टाएँ) और सात्त्विक (अपने आप होने वाले, जैसे स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कंप, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय)। संचारी भावों के नाम में निर्वेद, ग्लानि, शंका, चिंता, मोह, स्मृति, धृति, लज्जा, हर्ष, गर्व, विषाद, आवेग, जड़ता, उग्रता, उन्माद, मरण, त्रास जैसे शब्द आते हैं।
भाग 4 — रस पहचानने की विधि
चरण 1 — पंक्ति में कौन भाव है, यह एक शब्द में कहो। प्रेम, हँसी, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, घृणा, विस्मय, वैराग्य, संतान-स्नेह, ईश्वर-प्रेम। यही स्थायी भाव है।
चरण 2 — भाव को जगाने वाला आलंबन खोजो। प्रेमी (शृंगार), मृत स्वजन (करुण), शत्रु (वीर या रौद्र), डरावना दृश्य (भयानक), घृणित वस्तु (बीभत्स), अनोखी घटना (अद्भुत), बालक (वात्सल्य), संसार की नश्वरता (शांत)।
चरण 3 — अनुभाव देखो। आँसू और विलाप करुण में, ताल ठोकना और रोमांच वीर में, काँपना और भागना भयानक में, मुँह फेरना और थूकना बीभत्स में।
चरण 4 — रस का नाम चुनो और जोड़ी जाँच लो। रति-शृंगार, हास-हास्य, शोक-करुण, क्रोध-रौद्र, उत्साह-वीर, भय-भयानक, जुगुप्सा-बीभत्स, विस्मय-अद्भुत, निर्वेद-शांत।
चरण 5 — समान दिखते जोड़ों में भेद करो। भाग 7 के जोड़े यहीं काम आते हैं।
भाग 5 — छंद की मूल बातें
छंद के नियम समझने से पहले इन पदों को पक्का करो:
| पद | अर्थ |
|---|---|
| चरण (पद) | छंद की एक पंक्ति का खंड, जिसमें मात्राएँ या वर्ण गिने जाते हैं |
| मात्रा | किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाला समय |
| वर्ण | स्वर सहित अक्षर |
| यति | चरण में रुकने का स्थान |
| गति | छंद में प्रवाह या लय |
| तुक | चरणों के अंत की ध्वनि का मेल |
| गण | तीन वर्णों का समूह, जिसमें लघु-गुरु का क्रम तय है |
मात्रा-गणना के नियम. अ, इ, उ, ऋ जैसे ह्रस्व स्वर वाला वर्ण लघु है और उसकी एक मात्रा गिनी जाती है। आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ जैसे दीर्घ स्वर वाला वर्ण गुरु है और उसकी दो मात्राएँ गिनी जाती हैं। अनुस्वार (ं) और विसर्ग (ः) वाला वर्ण गुरु होता है। संयुक्ताक्षर से पहले का लघु वर्ण गुरु माना जाता है, जैसे "सत्य" में स गुरु हो जाता है। चंद्रबिंदु (ँ) से मात्रा नहीं बदलती, इसलिए "हँस" में दोनों वर्ण लघु हैं।
गण. तीन वर्णों के आठ गण होते हैं, जिनके सूत्र "यमाताराजभानसलगा" से मिलते हैं। लघु के लिए चिह्न है । और गुरु के लिए ऽ।
| गण | चिह्न | उदाहरण शब्द |
|---|---|---|
| यगण | ।ऽऽ | यशोदा |
| मगण | ऽऽऽ | मायावी |
| तगण | ऽऽ। | संसार |
| रगण | ऽ।ऽ | आरती |
| जगण | ।ऽ। | नमामि |
| भगण | ऽ।। | भारत |
| नगण | ।।। | कमल |
| सगण | ।।ऽ | सरला |
भाग 6 — प्रमुख छंद और उनके लक्षण
मात्रिक छंद
| छंद | लक्षण | उदाहरण |
|---|---|---|
| दोहा | अर्धसम, चार चरण; विषम चरण में 13 मात्राएँ, सम चरण में 11; कुल 48; सम चरणों के अंत में गुरु-लघु | रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े जुड़े गाँठ परि जाय॥ (रहीम) |
| सोरठा | अर्धसम, दोहे का उलटा: विषम चरण में 11, सम में 13; तुक विषम चरणों में | जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥ (तुलसीदास) |
| चौपाई | सम मात्रिक, चार चरण, हर चरण में 16 मात्राएँ | जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ (तुलसीदास) |
| रोला | सम मात्रिक, चार चरण, हर चरण में 24 मात्राएँ; यति 11 और 13 पर | नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है (मैथिलीशरण गुप्त) |
| कुंडलिया | विषम मात्रिक, छह चरण; पहले दो चरण दोहा, बाद के चार चरण रोला; दोहे का अंतिम चरण रोले का पहला, और आरंभ का शब्द अंत में लौटे | गिरिधर कविराय की रचनाएँ |
| छप्पय | छह चरण; पहले चार रोला के, बाद के दो उल्लाला के | नाभादास का भक्तमाल छप्पय में रचित है |
| बरवै | अर्धसम, विषम चरण में 12 और सम में 7 मात्राएँ | रहीम का बरवै नायिका भेद |
| हरिगीतिका | सम मात्रिक, हर चरण में 28 मात्राएँ (16 और 12); अंत में लघु-गुरु | गेय रचनाओं और स्तुतियों में प्रचलित |
वर्णिक छंद
| छंद | लक्षण |
|---|---|
| सवैया | 22 से 26 वर्ण प्रति चरण; मत्तगयंद में 23 वर्ण (सात भगण और दो गुरु) |
| कवित्त (मनहरण घनाक्षरी) | 31 वर्ण प्रति चरण (16 और 15 पर यति); अंत गुरु |
| इंद्रवज्रा | 11 वर्ण; गण: तगण, तगण, जगण और दो गुरु |
| उपेंद्रवज्रा | 11 वर्ण; गण: जगण, तगण, जगण और दो गुरु |
| वसंततिलका | 14 वर्ण |
| मालिनी | 15 वर्ण |
| मंदाक्रांता | 17 वर्ण |
| शिखरिणी | 17 वर्ण |
| शार्दूलविक्रीडित | 19 वर्ण |
| स्रग्धरा | 21 वर्ण |
मुक्त छंद. जिस कविता में मात्रा, वर्ण या चरण-संख्या का कोई बंधन न हो, वह मुक्त छंद है। आधुनिक कविता में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने इसे विशेष रूप से अपनाया।
भाग 7 — उलझाने वाले जोड़ों का भेद
| जोड़ा | भेद का निर्णायक शब्द |
|---|---|
| रस / स्थायी भाव | रस पाठक का आनंद है, स्थायी भाव उसका आधार। शोक = स्थायी भाव, करुण = रस |
| करुण / वियोग शृंगार | करुण में पुनर्मिलन की आशा नहीं (मृत्यु या अपूरणीय हानि); वियोग में मिलन की आशा रहती है |
| वीर / रौद्र | वीर में उत्साह और पराक्रम; रौद्र में क्रोध और प्रतिशोध |
| भयानक / बीभत्स | भयानक में भय (डर); बीभत्स में घृणा (घिन) |
| भयानक / अद्भुत | भयानक में डर से संकुचन; अद्भुत में आश्चर्य से आँखें फैलना |
| शांत / वात्सल्य | शांत में वैराग्य; वात्सल्य में संतान का स्नेह |
| दोहा / सोरठा | दोहा 13+11; सोरठा 11+13 (क्रम उलटा) |
| दोहा / रोला | दोहा अर्धसम (13-11); रोला सम मात्रिक (हर चरण 24) |
| चौपाई / हरिगीतिका | चौपाई 16 मात्रा; हरिगीतिका 28 मात्रा |
| मात्रिक / वर्णिक | मात्रिक में मात्राएँ गिनो; वर्णिक में अक्षर (वर्ण) गिनो |
भाग 8 — हल सहित उदाहरण
उदाहरण 1. "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।" में रस और स्थायी भाव बताइए। हल: पंक्ति में पराक्रम और युद्ध का वर्णन है। भाव उत्साह का है। रस वीर, स्थायी भाव उत्साह।
उदाहरण 2. "कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात। भरे भौन में करत हैं नैनन ही सों बात॥" में रस बताइए। हल: कहना, नटना, रीझना, खिझना, मिलना और लजाना, ये अनुभाव हैं। पात्र एक साथ हैं और नैनों से बात कर रहे हैं, अर्थात मिलन है। रस संयोग शृंगार, स्थायी भाव रति।
उदाहरण 3. "निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहत पावस ऋतु हम पै जबतें श्याम सिधारे॥" में रस बताइए और करुण से भेद कीजिए। हल: प्रिय के जाने पर आँसू बह रहे हैं और अंतर्निहित आशा है कि वे लौटेंगे। इसलिए वियोग शृंगार, करुण नहीं। करुण में प्रिय सदा के लिए चला गया होता, मिलन की आशा नहीं होती।
उदाहरण 4. "बेटे की अर्थी उठते देख माँ बेसुध हो गई।" में रस, आश्रय, आलंबन और एक अनुभाव बताइए। हल: भाव शोक का है, रस करुण। आश्रय माँ (जिसके मन में भाव जागा), आलंबन पुत्र की अर्थी (जिसके कारण जागा), अनुभाव बेसुध होना या आँसू। यहाँ पुनर्मिलन की आशा नहीं, इसलिए वियोग नहीं, करुण।
उदाहरण 5. "श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।" में रस बताइए। हल: पंक्ति में क्रोध शब्द ही है और अनुभाव हाथ मलना है। स्थायी भाव क्रोध, इसलिए रौद्र। इसे वीर से अलग रखो, क्योंकि यहाँ पराक्रम का उत्साह नहीं, क्रोध उमड़ा है।
उदाहरण 6. "किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत" में रस बताइए। हल: शिशु कृष्ण के घुटनों के बल चलने और किलकारी का वर्णन है। भाव संतान के प्रति स्नेह, स्थायी भाव वत्सलता। रस वात्सल्य।
उदाहरण 7. स्थायी भाव जुगुप्सा किस रस का है? हल: जुगुप्सा का अर्थ घृणा। घृणित दृश्य से जो भाव जगे वही बीभत्स है।
उदाहरण 8. "रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।" की मात्राएँ गिनकर छंद पहचानिए। हल: रहिमन धागा प्रेम का: र1 हि1 म1 न1 = 4, धा2 गा2 = 4, प्रे2 म1 = 3, का2 = 2; कुल 13। मत तोड़ो चटकाय: म1 त1 = 2, तो2 ड़ो2 = 4, च1 ट1 = 2, का2 य1 = 3; कुल 11। चरण 13 और 11 मात्रा का है, इसलिए दोहा।
उदाहरण 9. "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर" की मात्राएँ गिनिए। हल: जय: ज1 य1 = 2; हनुमान: ह1 नु1 मा2 न1 = 5; ज्ञान: ज्ञा2 न1 = 3; गुन: गु1 न1 = 2; सागर: सा2 ग1 र1 = 4। कुल 2+5+3+2+4 = 16। हर चरण 16 मात्रा, इसलिए चौपाई।
उदाहरण 10. "जो सुमिरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन।" की मात्राएँ गिनकर छंद बताइए। हल: पहला भाग जो सुमिरत सिधि होइ: जो2 सु1 मि1 र1 त1 सि1 धि1 हो2 इ1 = 11। दूसरा भाग गन नायक करिबर बदन: ग1 न1 ना2 य1 क1 क1 रि1 ब1 र1 ब1 द1 न1 = 13। 11 और 13 का क्रम दोहे से उलटा है, इसलिए सोरठा।
उदाहरण 11. "भारत" का गण बताइए। हल: भा2 र1 त1 = ऽ।। यह भगण है। चेतावनी: "भा" दीर्घ है, इसलिए पहला वर्ण गुरु है।
उदाहरण 12. कुंडलिया की बनावट बताइए। हल: कुल छह चरण। पहले दो चरण दोहा के, बाद के चार रोला के। दोहे का अंतिम चरण रोले के आरंभ में दोहराया जाता है और जिस शब्द से छंद शुरू होता है वही अंत में आता है। उत्तर दोहा और रोला का मिश्रण।
उदाहरण 13. सवैया और रोला में कौन मात्रिक है और कौन वर्णिक? हल: सवैया में वर्णों की गिनती होती है (22 से 26), इसलिए वर्णिक। रोला में मात्राओं की (24), इसलिए मात्रिक।
उदाहरण 14. "वृद्ध पिता के सामने जवान पुत्र का शव रखा है और वे सन्न हैं" में आश्रय, आलंबन और संचारी भाव बताइए। हल: भाव जिसके मन में जागा वह आश्रय, यानी पिता। जिसके कारण जागा वह आलंबन, यानी पुत्र का शव। संचारी भाव हो सकते हैं विषाद, मोह, स्मृति, जड़ता। रस करुण।
उदाहरण 15. "माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय" में रस और स्थायी भाव बताइए। हल: पंक्ति शरीर की नश्वरता और घमंड की व्यर्थता की ओर ले जाती है। भाव निर्वेद, इसलिए रस शांत।
भाग 9 — सामान्य भूलें
| भूल | क्यों लुभाती है | सही बात |
|---|---|---|
| शोक को रस मान लेना | शब्द पंक्ति में दिखता है | शोक स्थायी भाव है, रस करुण है |
| हर रोने वाली पंक्ति को करुण कहना | आँसू दोनों में हैं | मिलन की आशा हो तो वियोग शृंगार |
| वीर और रौद्र को एक मान लेना | दोनों में लड़ाई है | उत्साह = वीर, क्रोध = रौद्र |
| मात्रा गिनने में संयुक्ताक्षर से पहले का वर्ण भूलना | प्रायः लघु ही गिना जाता है | संयुक्त से पहले का वर्ण गुरु |
| चंद्रबिंदु (ँ) को गुरु मान लेना | अनुस्वार से मिलता-जुलता है | चंद्रबिंदु से मात्रा नहीं बदलती |
| दोहे को 24 मात्रा का मान लेना | एक पंक्ति के दो चरण जोड़कर | एक चरण 13 या 11, पूरी पंक्ति 24 |
| सोरठा और दोहे को उलटना | दोनों में 13 और 11 हैं | दोहा 13+11, सोरठा 11+13 |
| "नौ रस" में वात्सल्य गिनना | वात्सल्य प्रसिद्ध है | मूल नौ में नहीं, बाद में जोड़ा |
भाग 10 — तीव्र अभ्यास
| क्र. | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 1 | हास्य रस का स्थायी भाव | हास |
| 2 | वीर रस का स्थायी भाव | उत्साह |
| 3 | निर्वेद किस रस का स्थायी भाव है | शांत |
| 4 | भय किस रस का स्थायी भाव है | भयानक |
| 5 | विस्मय किस रस का स्थायी भाव है | अद्भुत |
| 6 | रौद्र रस का स्थायी भाव | क्रोध |
| 7 | शृंगार रस के दो पक्ष | संयोग और वियोग |
| 8 | दोहे के विषम चरण की मात्राएँ | 13 |
| 9 | सोरठा के सम चरण की मात्राएँ | 13 |
| 10 | चौपाई के हर चरण की मात्राएँ | 16 |
| 11 | रोला के हर चरण की मात्राएँ | 24 |
| 12 | कुंडलिया के कितने चरण होते हैं | छह |
| 13 | सवैया मात्रिक है या वर्णिक | वर्णिक |
| 14 | जगण का चिह्न | ।ऽ। |
| 15 | रस की निष्पत्ति का सूत्र किसने दिया | भरतमुनि (नाट्यशास्त्र) |
| 16 | विभाव के दो भेद | आलंबन और उद्दीपन |
भाग 11 — अभ्यास-क्रम
| दिन | क्या करें | समय |
|---|---|---|
| 1 | भाग 2 की रस-स्थायी भाव जोड़ियाँ याद करें, फिर उलटी दिशा में भी (स्थायी भाव से रस) | 25 मिनट |
| 2 | भाग 3 के चार अंग पढ़ें और किसी भी एक पंक्ति के चारों अंग लिखें | 25 मिनट |
| 3 | भाग 5 के मात्रा-नियम और गण याद करें; दस शब्दों की मात्राएँ गिनें | 25 मिनट |
| 4 | भाग 6 के छंद-लक्षण तालिका में प्रत्येक के लिए एक संख्या याद करें | 20 मिनट |
| 5 | भाग 8 के उदाहरण उत्तर ढककर हल करें | 30 मिनट |
| 6 | भाग 7 के जोड़े और भाग 10 का तीव्र अभ्यास | 20 मिनट |
| 7 | प्रश्न-बैंक की समयबद्ध परीक्षा; ग़लतियों की सूची | 30 मिनट |
मात्रा गिनने का अभ्यास रोज़ थोड़ा-थोड़ा करो। दोहे की चार पंक्तियाँ रोज़ गिनने से एक सप्ताह में हाथ बैठ जाता है।
भाग 12 — यह विषय कहाँ जुड़ता है
रस और छंद के साथ काव्य के तीसरे पक्ष अलंकार का अध्ययन अलंकार में है। अपठित काव्यांश में रस, अलंकार और भाव एक साथ पूछे जाते हैं; उसकी विधि अपठित पद्यांश में है। रस के स्थायी भावों के नाम भाव-शब्दावली से जुड़ते हैं, जिसमें पर्यायवाची शब्द से मदद मिलती है।
Practice questions
Now test yourself. 8 free sample questions with explanations. 27 more in the timed practice test.
Q1. रस के निष्पत्ति-सूत्र में 'स्थायी भाव' का सही अर्थ क्या है?
▸ Show answer & explanation
Answer: B
स्थायी भाव वह स्थिर एवं प्रधान मनोवृत्ति है जो विभाव, अनुभाव और संचारी (व्यभिचारी) भावों से पुष्ट होकर रस-रूप में निष्पन्न होती है। बाहरी कारण विभाव कहलाते हैं।
Q2. "मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे। यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे॥" — अभिमन्यु के इस कथन में कौन-सा रस है?
▸ Show answer & explanation
Answer: B
युद्ध के लिए उमड़ता 'उत्साह' स्थायी भाव यहाँ वीर रस की निष्पत्ति करता है; यमराज से भी युद्ध के लिए तत्पर होना वीरोचित उत्साह दर्शाता है।
Q3. "बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥" — यह किस छंद का उदाहरण है?
▸ Show answer & explanation
Answer: C
प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ और तुकबद्ध चार चरणों वाली यह रचना चौपाई है; रामचरितमानस की यह पंक्ति चौपाई का प्रसिद्ध उदाहरण है।
Q4. रौद्र रस और वीर रस दोनों में आवेश रहता है, किंतु इनका मूल अंतर किस आधार पर किया जाता है?
▸ Show answer & explanation
Answer: A
रौद्र रस का स्थायी भाव 'क्रोध' है जबकि वीर रस का स्थायी भाव 'उत्साह' है। यही दोनों रसों का आधारभूत भेद है।
Q5. शांत रस का स्थायी भाव क्या माना गया है?
▸ Show answer & explanation
Answer: B
शांत रस का स्थायी भाव 'निर्वेद' (वैराग्य/उदासीनता) है, जिसमें सांसारिक विषयों से विरक्ति का भाव रहता है।
Q6. हास्य रस का स्थायी भाव क्या है?
▸ Show answer & explanation
Answer: B
हास्य रस का स्थायी भाव 'हास' है। उत्साह वीर रस का, विस्मय अद्भुत रस का तथा जुगुप्सा वीभत्स रस का स्थायी भाव होता है।
Q7. "अब लौं नसानी, अब न नसैहौं। राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं॥" — संसार से विरक्ति प्रकट करती इन पंक्तियों में कौन-सा रस है?
▸ Show answer & explanation
Answer: A
सांसारिक विषयों के प्रति 'निर्वेद' (वैराग्य) यहाँ शांत रस की निष्पत्ति करता है; राम-कृपा से भव-निशा बीत जाने का भाव वैराग्यपरक है।
Q8. "नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाडिम का समझकर भ्रांति से। देख कर सहसा हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है॥" — इस तोते की भूल से उत्पन्न कौन-सा रस है?
▸ Show answer & explanation
Answer: A
तोते का नाक के मोती को अनार का दाना समझ बैठना तथा अपने ही प्रतिबिंब को दूसरा तोता मान लेना विसंगति उत्पन्न करता है, जिससे 'हास' स्थायी भाव जागता है — अतः हास्य रस है।
🔒 27 more questions
Attempt all 35 रस और छंद questions in real NTA exam format with timer and instant scoring.
Start practice test →