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Exam Topic CUET Hindi · 102 40 practice MCQs

संधि

संधि is a frequently tested area in CUET Hindi. Work through these free NTA-style sample questions with full answers and explanations, then attempt all 40 in a timed practice test to build exam-day speed.

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एक नज़र में

भाग 1 — संधि क्या है और क्यों होती है

Written and reviewed by Omveer Thakur, English & Languages faculty at UniDrill (M.A. English, University of Delhi · 9 years teaching). Prepared for the CUET UG Hindi paper.

दो शब्द साथ बोले जाएँ तो पहले शब्द की अंतिम ध्वनि और दूसरे शब्द की पहली ध्वनि आपस में टकराती हैं। जीभ को हर बार दोनों को अलग-अलग बोलना कठिन लगता है, इसलिए वह उन्हें मिलाकर एक सरल ध्वनि बना देती है। यही मेल संधि है। "विद्या" और "आलय" को बोलकर देखिए: विद्या-आलय की जगह मुँह स्वाभाविक रूप से "विद्यालय" बोलता है। इसी कारण संधि का आधार उच्चारण की सुविधा है, अर्थ नहीं।

संधि के प्रश्नों में कुछ पारिभाषिक शब्द बार-बार आते हैं। पूर्व पद पहला शब्द है, उत्तर पद दूसरा शब्द। जोड़ने की क्रिया संधि है और तोड़ने की क्रिया संधि-विच्छेद। जुड़े हुए शब्द को कई पुस्तकों में संधिज शब्द भी कहा जाता है।

प्रकार किन ध्वनियों का मेल एक पहचान उदाहरण
स्वर संधि स्वर + स्वर मेल-बिंदु पर स्वर या स्वर-जैसा परिवर्तन विद्या + आलय = विद्यालय
व्यंजन संधि व्यंजन + व्यंजन, या व्यंजन + स्वर पहले शब्द का अंतिम व्यंजन बदलता है सत् + जन = सज्जन
विसर्ग संधि विसर्ग (ः) + स्वर या व्यंजन पहले शब्द के अंत में ः था मनः + रथ = मनोरथ

रुकिए और सोचिए: "दिग्गज" किस प्रकार की संधि है? पूर्व पद दिक् के अंत में क् है, कोई स्वर या विसर्ग नहीं। इसी आधार पर अनुमान लगाइए।

उत्तर जाँचिए: दिक् + गज = दिग्गज। पहला शब्द व्यंजन (क्) पर समाप्त होता है, इसलिए यह व्यंजन संधि है।

भाग 2 — स्वर संधि: पाँच भेद और उनके कारण

स्वर संधि में पूर्व पद का अंतिम स्वर और उत्तर पद का पहला स्वर मिलते हैं। परिणाम पाँच रूपों में से एक होता है। नीचे हर भेद का नियम, उदाहरण और कारण दिया है।

भेद नियम उदाहरण यह क्यों होता है
दीर्घ अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ धर्म + अर्थ = धर्मार्थ; मुनि + इंद्र = मुनींद्र; भानु + उदय = भानूदय समान स्थान से बोले जाने वाले स्वर मिलकर उसी ध्वनि को लंबा कर देते हैं
गुण अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर् नर + इंद्र = नरेंद्र; सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + ऋषि = महर्षि ए में अ और इ की ध्वनि मिली है, ओ में अ और उ की; ये मिश्र स्वर हैं
वृद्धि अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ एक + एक = एकैक; सदा + एव = सदैव; वन + औषधि = वनौषधि अ के बाद पहले से मिश्र स्वर आए तो ध्वनि और भारी होकर ऐ या औ बनती है
यण् इ/ई + भिन्न स्वर = य्; उ/ऊ + भिन्न स्वर = व्; ऋ + भिन्न स्वर = र् अति + अधिक = अत्यधिक; सु + आगत = स्वागत; पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा इ/उ/ऋ के बाद असमान स्वर आए तो ये अपने समान स्थान के अर्धस्वर य/व/र बन जाते हैं
अयादि ए + स्वर = अय्; ऐ + स्वर = आय्; ओ + स्वर = अव्; औ + स्वर = आव् ने + अन = नयन; नै + अक = नायक; पो + अन = पवन; पौ + अक = पावक मिश्र स्वर आगे के स्वर से टकराकर फट जाता है: ए = अ + य्, ओ = अ + व्

चार बातें याद रखिए। दीर्घ में दोनों स्वर सवर्ण (एक जैसे) होते हैं; इसलिए महा + ईश = महेश दीर्घ नहीं है, क्योंकि आ और ई सवर्ण नहीं हैं, वह गुण है। गुण का फल हमेशा ए, ओ या अर् होता है। वृद्धि का फल हमेशा ऐ या औ। यण् और अयादि में फल में स्वर नहीं बल्कि य्, व्, र् जैसी अर्धस्वर ध्वनि दिखती है।

पाठ्यपुस्तक से आगे। परीक्षा के लिए: ऋ से जुड़ने वाले नियम गुण (महर्षि) और यण् (पित्राज्ञा) में आते हैं, इसलिए ऋ देखते ही दोनों संभावनाएँ जाँचिए। वास्तव में: "ऋ" को आज बोलचाल में अधिकतर "रि" की तरह बोला जाता है, पर संधि के नियम इसे स्वर ही मानते हैं। इसी कारण देव + ऋषि में अ + ऋ मिलकर अर् बनता है और शब्द देवर्षि हो जाता है।

भाग 3 — पहचान-तालिका: बने हुए शब्द को देखकर भेद तय करना

संधि-विच्छेद करते समय आप उलटी दिशा में चलते हैं। इसलिए आपको मेल-बिंदु पर दिखी ध्वनि से भेद पहचानना आना चाहिए।

मेल-बिंदु पर दिखा संभावित भेद विच्छेद का ढंग उदाहरण
आ, ई, ऊ दीर्घ आ = अ/आ + अ/आ; ई = इ/ई + इ/ई; ऊ = उ/ऊ + उ/ऊ रवींद्र = रवि + इंद्र
ए, ओ, अर् गुण ए = अ/आ + इ/ई; ओ = अ/आ + उ/ऊ; अर् = अ/आ + ऋ महोत्सव = महा + उत्सव
ऐ, औ वृद्धि ऐ = अ/आ + ए/ऐ; औ = अ/आ + ओ/औ तथैव = तथा + एव
संयुक्त अक्षर में य, व या र (जैसे त्य, न्व, त्र) यण् य = इ/ई; व = उ/ऊ; र = ऋ प्रत्येक = प्रति + एक
स्वतंत्र य या व के साथ अ/आ (जैसे नयन, पावक) अयादि अय = ए; आय = ऐ; अव = ओ; आव = औ नयन = ने + अन

यण् और अयादि को अलग करने की सबसे सरल युक्ति यह है कि यण् में य्, व् या र् अपने पहले वाले व्यंजन से जुड़ा होता है (अत्यधिक में त्य, अन्वय में न्व, पित्राज्ञा में त्रा), जबकि अयादि में य या व अलग अक्षर बनकर आता है (न-य-न, प-व-न)।

एक और जाँच: गुण का ओ और विसर्ग संधि का ओ दोनों शब्द में दिख सकते हैं (सूर्योदय और मनोरथ)। जो विच्छेद दोनों पदों को अर्थपूर्ण बनाए, वही सही है। सूर्य + उदय अर्थपूर्ण है; मनः + रथ अर्थपूर्ण है, जबकि "मन + उरथ" का कोई अर्थ नहीं।

रुकिए और सोचिए: "अन्वय" में न्व दिख रहा है। यह कौन-सी संधि होगी और विच्छेद क्या होगा?

उत्तर जाँचिए: न्व में व्, यानी उ का परिवर्तन दिख रहा है; इसलिए यण् संधि है। अन्वय = अनु + अय।

भाग 4 — व्यंजन संधि: नियम और कारण

व्यंजन संधि का एक ही बड़ा कारण है: घोष और अघोष का मेल। क, च, ट, त, प अघोष (हल्की) ध्वनियाँ हैं; ग, ज, ड, द, ब और सारे स्वर घोष (गूँजदार) हैं। जब घोष ध्वनि अगली हो, तो उच्चारण में पिछला अघोष व्यंजन भी घोष हो जाता है। जीभ की पूरी सुविधा इसी में है।

नियम उदाहरण
वर्ग का पहला व्यंजन (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, या वर्ग का 3-4 वर्ण, य र ल व ह = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्) दिक् + गज = दिग्गज; जगत् + ईश = जगदीश; सत् + आचार = सदाचार; उत् + घाटन = उद्घाटन; षट् + आनन = षडानन; तत् + अनुसार = तदनुसार
वर्ग का पहला व्यंजन + न या म = उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण वाक् + मय = वाङ्मय; उत् + नति = उन्नति; जगत् + नाथ = जगन्नाथ; सत् + मार्ग = सन्मार्ग; षट् + मास = षण्मास
त् + च/छ = च्च/च्छ; त् + ज = ज्ज; त् + ट = ट्ट; त् + ल = ल्ल उत् + चारण = उच्चारण; सत् + जन = सज्जन; उत् + लास = उल्लास
त् + श = च्छ उत् + श्वास = उच्छ्वास
त् + ह = द्ध उत् + हार = उद्धार
म् + वर्ग का व्यंजन = उसी वर्ग का पंचमाक्षर या अनुस्वार सम् + गम = संगम; सम् + तोष = संतोष; सम् + पूर्ण = संपूर्ण
म् + य, र, ल, व, श, ष, स, ह = अनुस्वार (ं) सम् + योग = संयोग; सम् + वाद = संवाद; सम् + सार = संसार; सम् + हार = संहार
म् + म = म्म; म् + स्वर = म् स्वर से जुड़ जाता है सम् + मान = सम्मान; सम् + आचार = समाचार
ऋ, र या ष के बाद आने वाला न् = ण् परि + नाम = परिणाम; प्र + नाम = प्रणाम; राम + अयन = रामायण
स्वर (अ/आ से भिन्न) के बाद स् = ष् अभि + सेक = अभिषेक; वि + सम = विषम; नि + सेध = निषेध
स्वर + छ = च्छ वि + छेद = विच्छेद; आ + छादन = आच्छादन; अनु + छेद = अनुच्छेद; स्व + छंद = स्वच्छंद

अपवाद भी याद रखें: सम् + राट् = सम्राट् (यहाँ म् अनुस्वार नहीं बनता)।

यह क्यों ज़रूरी है। "सत् + जन" को "सत्जन" बोलने में जीभ को त् से ज पर कूदना पड़ता है। "सज्जन" में त् ही ज्ज बन जाता है, इसलिए वही रूप चलता है। परीक्षा में इसका सीधा लाभ यह है कि विच्छेद में जो आधा व्यंजन दिखे (ज्ज, द्ध, च्छ), वह प्रायः पहले पद के अंतिम त् का बदला हुआ रूप होता है।

भाग 5 — विसर्ग संधि: नियम और कारण

विसर्ग (ः) मूलतः स् या र् की हल्की छाया है। उसके बाद जैसी ध्वनि आती है, वह उसी के अनुरूप बदल जाता है। आगे घोष ध्वनि हो तो विसर्ग घोष रूप (ओ या र्) लेता है; आगे अघोष ध्वनि हो तो वह उसी स्थान की सिस वाली ध्वनि (श्, ष्, स्) बनता है।

नियम उदाहरण
अः + अ, या वर्ग के 3, 4, 5 वर्ण, या य, र, ल, व, ह = ः का ओ मनः + अनुकूल = मनोनुकूल; मनः + रथ = मनोरथ; यशः + दा = यशोदा; तपः + बल = तपोबल; सरः + वर = सरोवर; अधः + गति = अधोगति
अ/आ से भिन्न स्वर + ः + स्वर, या वर्ग के 3, 4, 5 वर्ण, या य, र, ल, व, ह = ः का र् निः + आशा = निराशा; निः + धन = निर्धन; दुः + गम = दुर्गम; दुः + उपयोग = दुरुपयोग; आशीः + वाद = आशीर्वाद; पुनः + जन्म = पुनर्जन्म
ः + र = ः का लोप और पहला स्वर दीर्घ निः + रोग = नीरोग; निः + रस = नीरस; निः + रव = नीरव
ः + च/छ = श् निः + चल = निश्चल; निः + छल = निश्छल; दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
ः + त/थ = स् निः + तेज = निस्तेज; नमः + ते = नमस्ते; मनः + ताप = मनस्ताप; दुः + तर = दुस्तर
इ/उ के बाद ः + क, ख, प, फ = ष् निः + कपट = निष्कपट; दुः + कर = दुष्कर; निः + फल = निष्फल; निः + पाप = निष्पाप; आविः + कार = आविष्कार; बहिः + कार = बहिष्कार
अ के बाद ः + क, ख, प, फ = विसर्ग बना रहता है प्रातः + काल = प्रातःकाल; अंतः + करण = अंतःकरण; पयः + पान = पयःपान
अपवाद: ः + क = स् नमः + कार = नमस्कार; पुरः + कार = पुरस्कार; तिरः + कार = तिरस्कार; भाः + कर = भास्कर

दो बातें ध्यान से देखिए। पहली, इ/उ के बाद ः + क पर ष् बनता है (निष्काम), पर अ के बाद ः + क पर विसर्ग ही रहता है (प्रातःकाल); इसलिए पूर्व पद का अंतिम स्वर देखना आवश्यक है। दूसरी, ः + र वाले शब्दों में "निर्र" जैसा रूप नहीं बनता, क्योंकि दो र् पास-पास बोलना कठिन है; इसी से पहला र् लुप्त होकर इ दीर्घ ई हो जाता है।

भाग 6 — संधि-विच्छेद की विधि

हर प्रश्न में चार कदम चलिए। यह विधि स्वर, व्यंजन और विसर्ग तीनों पर लागू होती है।

कदम क्या करें उदाहरण: सूर्योदय
1. मेल-बिंदु खोजें शब्द के बीच वह अक्षर देखें जो असामान्य लगे (ो, ै, ्य, ज्ज, ष्, र्) र्यो में ो
2. परिवर्तन पहचानें बना हुआ वर्ण किस नियम की निशानी है, यह तय करें ो = अ + उ (गुण)
3. नियम उलटाएँ बने हुए वर्ण की जगह दोनों मूल वर्ण रखें सूर्य + उदय
4. अर्थ से जाँचें दोनों खंड अर्थपूर्ण हों, तभी उत्तर पक्का करें सूर्य और उदय, दोनों सार्थक

यदि प्रश्न में विकल्प दिए हों तो उलटी जाँच और भी तेज़ है: हर विकल्प के दोनों खंडों को जोड़कर देखिए कि क्या मूल शब्द बनता है। जो विकल्प मूल शब्द दे, वही सही है; बाकी तीन विकल्प अधिकतर नियम का कोई एक चरण चूकते हैं।

भाग 7 — CUET में पूछे जाने वाले प्रश्न-प्रकार

प्रश्न-प्रकार नमूना कैसे हल करें
संधि-विच्छेद चुनिए "पुस्तकालय" का सही विच्छेद विकल्पों को जोड़कर जाँचें
संधि कीजिए "सदा + एव" का जुड़ा रूप नियम आगे की दिशा में लगाएँ: आ + ए = ऐ
भेद बताइए "अत्यधिक" में कौन-सी संधि है मेल-बिंदु का वर्ण देखें: त्य = यण्
गलत जोड़ी निम्न में गलत विच्छेद कौन-सा है हर विकल्प को जोड़कर जाँचें
कथन-आधारित "सज्जन में व्यंजन संधि है" सही या गलत पूर्व पद का अंतिम वर्ण देखें: त्, व्यंजन
सूची-मिलान संधि-शब्द और भेद का मिलान पहले सरल जोड़ियाँ मिलाएँ, फिर शेष

भाग 8 — हल सहित उदाहरण

क्र. प्रश्न उत्तर तर्क
1 विद्यालय का विच्छेद और भेद विद्या + आलय; दीर्घ स्वर संधि आ + आ मिलकर एक लंबा आ बना
2 नरेंद्र का विच्छेद और भेद नर + इंद्र; गुण स्वर संधि अ + इ = ए
3 सूर्योदय का विच्छेद और भेद सूर्य + उदय; गुण स्वर संधि अ + उ = ओ
4 महर्षि का विच्छेद और भेद महा + ऋषि; गुण स्वर संधि आ + ऋ = अर्
5 सदैव का विच्छेद और भेद सदा + एव; वृद्धि स्वर संधि आ + ए = ऐ
6 वनौषधि का विच्छेद और भेद वन + औषधि; वृद्धि स्वर संधि अ + औ = औ
7 अत्यधिक का विच्छेद और भेद अति + अधिक; यण् स्वर संधि इ बदलकर य् हुआ, जो त से जुड़ा है
8 स्वागत का विच्छेद और भेद सु + आगत; यण् स्वर संधि उ बदलकर व् हुआ
9 नयन का विच्छेद और भेद ने + अन; अयादि स्वर संधि ए + अ = अय; य अलग अक्षर है
10 पावक का विच्छेद और भेद पौ + अक; अयादि स्वर संधि औ + अ = आव
11 जगदीश का विच्छेद और भेद जगत् + ईश; व्यंजन संधि त् के बाद स्वर आया तो त् घोष होकर द् हुआ
12 उन्नति का विच्छेद और भेद उत् + नति; व्यंजन संधि त् + न = न्न
13 निर्धन का विच्छेद और भेद निः + धन; विसर्ग संधि इ के बाद ः और घोष ध (वर्ग का 4) आया, इसलिए ः = र्
14 मनोहर का विच्छेद और भेद मनः + हर; विसर्ग संधि अः के बाद ह आया, इसलिए ः = ओ
15 निष्फल का विच्छेद और भेद निः + फल; विसर्ग संधि इ के बाद ः + फ = ष्

भाग 9 — सामान्य भूलें (ट्रैप)

ट्रैप यह क्यों लुभाता है सच्चाई
महेश, गणेश, परमेश्वर को दीर्घ मान लेना "ई" दिख रहा है, इसलिए ई-वाली दीर्घ लगती है अ/आ + ई = ए, यानी गुण संधि। दीर्घ में दोनों स्वर सवर्ण होते हैं
गुण और वृद्धि का उलटा लगाना दोनों में ए/ऐ और ओ/औ मिलते-जुलते हैं ए, ओ आए तो गुण; ऐ, औ आए तो वृद्धि
यण् और अयादि में गड़बड़ दोनों में य/व दिखता है यण् में य, व, र पहले व्यंजन से जुड़े (त्य, न्व); अयादि में अलग अक्षर (नयन, पवन)
ओ को हमेशा गुण मानना सूर्योदय में गुण है, तो मनोरथ में भी वही लगता है ओ के बाद पूरा अर्थपूर्ण शब्द (रथ, हर) बन रहा हो तो विसर्ग संधि; उ-वाला शब्द बन रहा हो तो गुण
प्रातःकाल और निष्काम को एक जैसा मानना दोनों में ः + क है अ के बाद ः बना रहता है; इ/उ के बाद ष् बनता है
नमस्कार, पुरस्कार को निष्कार जैसा सोचना ः + क पर ष् का नियम याद रहता है नमः, पुरः, तिरः, भाः के बाद क पर स् बनता है। ये अपवाद हैं
निः + रोग = निर्रोग लिख देना र् आने का नियम याद है ः + र पर पहला र् लुप्त होता है और इ दीर्घ हो जाता है: नीरोग
सज्जन को सद् + जन तोड़ना उच्चारण में द् जैसी ध्वनि सुनाई देती है मूल पद सत् है और ज्ज उसी त् के परिवर्तन से बना है: सत् + जन

भाग 10 — तेज़ अभ्यास (उत्तर सहित)

पहले उत्तर ढककर स्वयं हल कीजिए, फिर मिलान कीजिए।

प्रश्न उत्तर
विद्यार्थी का विच्छेद विद्या + अर्थी (दीर्घ)
मुनींद्र का विच्छेद मुनि + इंद्र (दीर्घ)
रमेश का विच्छेद रमा + ईश (गुण)
गंगोदक का विच्छेद गंगा + उदक (गुण)
देवर्षि का विच्छेद देव + ऋषि (गुण)
तथैव का विच्छेद तथा + एव (वृद्धि)
महौषध का विच्छेद महा + औषध (वृद्धि)
प्रत्येक का विच्छेद प्रति + एक (यण्)
व्याख्या का विच्छेद वि + आख्या (यण्)
पित्राज्ञा का विच्छेद पितृ + आज्ञा (यण्)
गायक का विच्छेद गै + अक (अयादि)
भवन का विच्छेद भो + अन (अयादि)
उज्ज्वल का विच्छेद उत् + ज्वल (व्यंजन)
षण्मुख का विच्छेद षट् + मुख (व्यंजन)
संयोग का विच्छेद सम् + योग (व्यंजन)
अभिषेक का विच्छेद अभि + सेक (व्यंजन)
नीरस का विच्छेद निः + रस (विसर्ग)
आशीर्वाद का विच्छेद आशीः + वाद (विसर्ग)
प्रातःकाल का विच्छेद प्रातः + काल (विसर्ग)
नमस्कार का विच्छेद नमः + कार (विसर्ग)
महा + उत्सव का जुड़ा रूप महोत्सव
सु + आगत का जुड़ा रूप स्वागत
उत् + हार का जुड़ा रूप उद्धार
दुः + गम का जुड़ा रूप दुर्गम

भाग 11 — अभ्यास-योजना और जुड़े पृष्ठ

दिन समय क्या करें
1 से 2 20 मिनट स्वर संधि के पाँच नियम तालिका देखे बिना लिखें; हर भेद के तीन-तीन शब्द याद करें
3 20 मिनट व्यंजन संधि के नियम और अपवाद (सम्राट्); 15 शब्दों का विच्छेद
4 20 मिनट विसर्ग संधि के नियम; नमस्कार, पुरस्कार जैसे अपवाद
5 से 6 15 मिनट मिश्रित 20 शब्द: पहले भेद बताइए, फिर विच्छेद
हर दिन 5 मिनट भाग 10 के 10 शब्द, घड़ी लगाकर: प्रति शब्द 20 सेकंड से अधिक नहीं

परीक्षा से पहले का अंतिम दोहराव भाग 9 के ट्रैप से कीजिए। जिस विकल्प पर दो नियम टकराएँ, उसे पहले अर्थ से जाँचिए और फिर तय कीजिए; नेगेटिव अंकन में अनुमान से बचना बेहतर है।

संधि और समास में अंतर साफ़ रखने के लिए समास का पृष्ठ पढ़ें। उपसर्ग वाले शब्दों (अति, प्र, सु, वि) की पहचान उपसर्ग और प्रत्यय से पक्की होगी। शब्द की रचना और स्रोत समझने के लिए शब्द-भेद देखें, और जोड़े गए शब्दों की वर्तनी के लिए वाक्य शुद्धि और वर्तनी उपयोगी रहेगा।

एक पंक्ति का सार: मेल-बिंदु पर बनी ध्वनि देखो (आ/ई/ऊ दीर्घ; ए/ओ/अर् गुण; ऐ/औ वृद्धि; जुड़े य/व/र यण्; अलग अय/आय/अव/आव अयादि), आधा व्यंजन बदले तो व्यंजन संधि, ः बदले तो विसर्ग संधि, और अंत में दोनों खंडों के अर्थ से जाँचो।

Practice questions

Now test yourself. 8 free sample questions with explanations. 32 more in the timed practice test.

Q1. 'अन्तःकरण' शब्द में कौन-सी संधि है?

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Answer: C

अन्तः + करण में विसर्ग के बाद 'क' (कठोर वर्ण) आता है और यहाँ विसर्ग यथावत बना रहता है। विसर्ग से सम्बन्धित होने के कारण यह विसर्ग संधि है। अतः अन्तः + करण = अन्तःकरण।

Q2. 'पवित्र' शब्द में निहित संधि का सही विच्छेद एवं नाम है—

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Answer: A

पो + इत्र में 'ओ' के बाद असमान स्वर 'इ' आने पर 'ओ' का 'अव्' हो जाता है (ओ + इ = अवि), यह अयादि स्वर संधि है। अतः पो + इत्र = पवित्र।

Q3. 'भानूदय' शब्द का सही संधि-विच्छेद एवं प्रकार चुनिए।

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Answer: A

भानु + उदय में 'उ' और 'उ' मिलकर दीर्घ 'ऊ' बनते हैं (उ + उ = ऊ), यह दीर्घ स्वर संधि है। अतः भानु + उदय = भानूदय।

Q4. 'एकैक' शब्द में प्रयुक्त संधि का सही विच्छेद एवं प्रकार है—

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Answer: B

एक + एक में 'अ' और 'ए' मिलकर 'ऐ' बनते हैं (अ + ए = ऐ), यह वृद्धि स्वर संधि है। अतः एक + एक = एकैक।

Q5. 'सज्जन' शब्द में प्रयुक्त संधि का सही विच्छेद एवं प्रकार है—

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Answer: B

सत् + जन में 'त्' के बाद 'ज' (वर्ग का तीसरा अक्षर/घोष) आने पर 'त्' का 'ज्' हो जाता है। अतः सत् + जन = सज्जन, यह व्यंजन संधि है।

Q6. 'विद्यालय' शब्द का सही संधि-विच्छेद कौन-सा है?

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Answer: B

'विद्या' का अंतिम 'आ' और 'आलय' का प्रारम्भिक 'आ' मिलकर दीर्घ 'आ' बनाते हैं (आ + आ = आ)। अतः विद्या + आलय = विद्यालय, यह दीर्घ स्वर संधि है।

Q7. 'उच्चारण' शब्द का सही संधि-विच्छेद कौन-सा है?

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Answer: A

उत् + चारण में 'त्' के बाद 'च' (तालव्य) आने पर 'त्' का 'च्' हो जाता है। अतः उत् + चारण = उच्चारण, यह व्यंजन संधि है।

Q8. 'निःचल' से बना सही संधि-शब्द कौन-सा है?

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Answer: A

निः + चल में विसर्ग के बाद 'च' (तालव्य) आने पर विसर्ग 'श्' में बदल जाता है। अतः निः + चल = निश्चल, यह विसर्ग संधि है।

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